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करबला का पहला सबक मुस्लिम इब्ने अकील

ईद उल अज़हा क़ुर्बानी को याद करने का त्यौहार है। हज़रत इब्राहीम (अस) ने अपने बेटे को छुरी के नीचे रखकर बता दिया की मरज़ी ए इलाह से बड़ा कुछ भी नहीं। बच्चों की क़ुर्बानी का जज़्बा हज़रत इब्राहीम तक न रुका। उनके वारिसान ने जब-जब वक़्त पड़ा, अपने बच्चों को दीन की राह में क़ुर्बान कर दिया। इसी तारीख़ ने देखा किस तरह इमाम हुसैन (अस) ने अपने छह माह के बच्चे को तीर की ज़द पर लाकर रखा और कैसे अट्ठारह साल के बेटे के कलेजे से टूटी हुई बरछी निकाली। लेकिन हज़रत इस्माइल और हज़रत अली अकबर की क़ुर्बानी के दरमियान एक मरहला हज़रत मुस्लिम इब्ने अक़ील और उनके दो मासूम बच्चों का भी आता है। मुस्लिम अपने बच्चों के साथ इमाम हुसैन के सफीर (दूत) बनकर कूफा पहुंचे थे। मक़सद था इमाम की आमद से पहले कूफा का माहौल जानना और अपने मददगारों को जुटाना। लेकिन ईद से दो रोज़ पहले कूफा में मुस्लिम इब्ने अक़ील और उनके दो बेटे बेरहमी से ज़िबह कर दिए गए। मुस्लिम इब्ने अक़ील इस्लाम की तारीख़ में दो वजहों से अहम हैं। एक, जिस मुआशरे में भाई भाई के ख़ून का प्यासा है, तख़्त के लिए भाई-भतीजे का क़त्ल करते हैं वहां हज़रत मुस्लिम ने अ...